​झारखंड में अनुसूचित जाति (SC) वित्त एवं विकास निगम की निष्क्रियता केवल एक विभाग की विफलता नहीं है, राज्य के एक बड़े कार्यशील वर्ग को 'आर्थिक दासता' की ओर धकेलने वाला नीतिगत अपराध है।

​झारखंड निर्माण के ढाई दशक बाद भी यदि राज्य का दलित समुदाय अपनी बुनियादी आर्थिक जरूरतों के लिए सरकारी तंत्र के बजाय साहूकारों के रहम-ओ-कर्म पर निर्भर है, तो यह हमारी 'कल्याणकारी राज्य' की अवधारणा पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। 'अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम' वह धुरी थी जिसके इर्द-गिर्द इस समुदाय के उद्यमिता और स्वावलंबन के सपने बुने गए थे। लेकिन आज यह संस्थान स्वयं 'प्रशासनिक वेंटिलेटर' पर है।

SC वित्त एवं विकास निगम

​टूटी हुई कड़ियाँ और लौटता पैसा

​एक तरफ केंद्र सरकार का राष्ट्रीय अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम (NSFDC) रियायती दरों (4% से 6%) पर करोड़ों रुपये का ऋण देने को तैयार खड़ा है, वहीं दूसरी तरफ झारखंड में इस धन को प्राप्त करने और लाभार्थियों तक पहुँचाने वाला 'सेतु' ही गायब है। जब राज्य में निगम का पूर्णकालिक बोर्ड और अध्यक्ष ही नहीं होंगे, तो केंद्र को 'प्रोजेक्ट रिपोर्ट' कौन भेजेगा? नतीजा यह है कि केंद्र से मिलने वाला फंड या तो आवंटित ही नहीं होता या वित्तीय वर्ष के अंत में सरेंडर कर दिया जाता है। यह राज्य के आर्थिक हितों के साथ एक गंभीर खिलवाड़ है।

​उद्यमी नहीं, मजदूर बनाने की नीति?

​व्यवसाय के लिए बैंक 'कोलेटरल' (गारंटी) मांगते हैं, जो इस हाशिए पर खड़े समुदाय के पास प्रायः नहीं होती। यहाँ वित्त निगम 'गारंटर' की भूमिका निभाकर एक युवा को 'मजदूर' से 'मालिक' बनाने का मार्ग प्रशस्त करता था। निगम की निष्क्रियता ने राज्य के हजारों हुनरमंद युवाओं के लिए स्वरोजगार के दरवाजे बंद कर दिए हैं। शिक्षा ऋण न मिलने के कारण मेधावी छात्र उच्च शिक्षा से वंचित हो रहे हैं और महिला समृद्धि योजना के ठप होने से ग्रामीण महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण महज एक चुनावी नारा बनकर ही रह गया है।

​अघोषत साहूकारी प्रथा का पुनर्जन्म

​संस्थानों की विफलता हमेशा शोषण के नए रास्ते खोलती है। जब सरकारी दफ्तरों से ऋण की फाइलें आगे नहीं बढ़तीं, तो लोग स्थानीय साहूकारों के पास जाते हैं। 24% से 36% तक की सालाना ब्याज दरें इस समुदाय को 'कर्ज के चक्रव्यूह' (Debt Trap) में फँसा देती हैं। यह न केवल उनकी वर्तमान आय को लील रही है, बल्कि उनकी पैतृक संपत्तियों और भूमि को भी खतरे में डाल रही है। क्या हम 21वीं सदी के झारखंड में 'आधुनिक बंधुआ मजदूरी' को फलते-फूलते देखना चाहते हैं?

​फाइलों में दफन संकल्प

​प्रशासनिक गलियारों में इस संकट की वजह 'प्रक्रियात्मक देरी' बताई जाती है। कभी नियुक्ति की फाइलें कार्मिक विभाग में अटकती हैं, तो कभी नियमों के नवीनीकरण (Adaptation) का बहाना बनाया जाता है। 'अतिरिक्त प्रभार' पर चल रहे कल्याण विभाग के अधिकारियों के पास इस निगम को पुनर्जीवित करने की न तो फुर्सत है और न ही शायद प्राथमिकता। राजनीतिक दलों के लिए यह निगम केवल 'राजनीतिक नियुक्तियों' का एक जरिया मात्र बनकर रह गया है, जबकि इसके पीछे लाखों लोगों की आजीविका जुड़ी है।

अब और प्रतीक्षा क्यों?

​यदि सरकार वास्तव में 'अंत्योदय' और सामाजिक न्याय के प्रति गंभीर है, तो उसे कागजी दावों से आगे बढ़ना होगा। PM-AJAY जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं का लाभ सीधे लाभार्थियों तक पहुँचाने के लिए एक 'सक्रिय और स्वायत्त' वित्त निगम की अनिवार्य आवश्यकता है।

​झारखंड के दलित समुदाय को 'खैरात' नहीं, बल्कि उनका 'आर्थिक अधिकार' चाहिए। राज्य सरकार को अविलंब निगम का पुनर्गठन कर, उसे पर्याप्त बजट और पेशेवर नेतृत्व प्रदान करना चाहिए। यदि अब भी देरी हुई, तो सामाजिक-आर्थिक असमानता की यह खाई इतनी गहरी हो जाएगी कि इसे पाटना भविष्य की सरकारों के लिए असंभव होगा।