SC परामर्शदात्री परिषद का गठन केवल एक प्रशासनिक कदम नहीं; यह झारखंड के सामाजिक ताने-बाने में न्याय और समावेशन की पुनर्स्थापना का प्रतीक होगा।
रांची: झारखंड के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में अनुसूचित जाति समुदाय की उपेक्षा केवल आंकड़ों या नीतिगत खामियों का परिणाम नहीं है; यह उस असंतुलन का दर्पण है जो संवैधानिक वादों और वास्तविक प्रशासनिक व्यवहार के बीच मौजूद है। परामर्शदात्री परिषद का अभाव न केवल संस्थागत कमी है, बल्कि वह एक ऐसी खामोशी है जो पीड़ित आवाजों को दबा देती है और न्याय के दायरे को संकुचित कर देती है।
समस्या का सार और उसका मानवीय आयाम
झारखंड में अनुसूचित जाति समुदाय लगभग 12–14 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करता है, पर उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। भूमिहीनता, अस्थायी आजीविका, सीमित शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच—ये केवल नीतिगत आंकड़े नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की जिंदगी के वे पहलू हैं जो पीढ़ियों को पीछे धकेलते हैं। परामर्शदात्री परिषद का अभाव इन जमीनी वास्तविकताओं को सुनने, समझने और नीतिगत रूप में बदलने की प्रक्रिया को बाधित करता है।
संस्थागत अभाव के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नुकसान
- नीति निर्माण में प्रतिनिधित्व का अभाव: जब समुदाय का समावेशी प्रतिनिधित्व नहीं होता, तो नीतियाँ सामान्यीकृत और असंगत बन जाती हैं। इससे योजनाएँ जमीन पर प्रभावहीन रह जाती हैं और स्थानीय जरूरतें अनदेखी रह जाती हैं।
- फंड प्रबंधन और पारदर्शिता की कमी: SCSP जैसे समर्पित फंडों की निगरानी और लक्षित उपयोग तभी सुनिश्चित हो सकता है जब एक स्वतंत्र, जवाबदेह मंच मौजूद हो। परिषद के बिना फंड का दुरुपयोग या विस्थापन सामान्य हो जाता है।
- क्रियान्वयन में देरी और लाभार्थियों तक पहुँच में बाधा: छात्रवृत्ति, कौशल प्रशिक्षण और स्वरोजगार योजनाएँ तभी असरदार होंगी जब उनका निरीक्षण और समय-समय पर पुनर्मूल्यांकन हो। परामर्शदात्री निकाय के अभाव में भ्रष्टाचार और नौकरशाही जटिलताएँ बढ़ती हैं।
- अत्याचारों और भेदभाव के खिलाफ संरक्षण का कमजोर होना: एक समर्पित परिषद पीड़ितों की शिकायतों को सुनने, मामलों की निगरानी करने और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सिफारिशें देने में सक्षम होती है; इसके बिना पीड़ितों की आवाज़ अक्सर खो जाती है।
संवैधानिक और नैतिक तर्क
संविधान ने सामाजिक न्याय और समानता के सिद्धांतों को स्थापित किया है। अनुच्छेद 338 जैसे प्रावधानों का उद्देश्य कमजोर वर्गों के संरक्षण के लिए संस्थागत व्यवस्था बनाना है। परामर्शदात्री परिषद केवल एक प्रशासनिक इकाई नहीं; यह संवैधानिक वचनबद्धता का स्थानीय रूप है—एक ऐसा मंच जो शिकायतों को सुनकर, नीतियों को संवेदनशील बनाकर और संसाधनों के लक्षित उपयोग को सुनिश्चित करके वास्तविक समावेशन की दिशा में काम कर सकता है।
गठन में देरी के कारणों का गहन विश्लेषण
- राजनीतिक प्राथमिकता और पहचान-आधारित विमर्श: झारखंड के निर्माण के बाद से आदिवासी पहचान और उससे जुड़ी नीतियाँ राजनीतिक विमर्श का केंद्र रहीं। इस पहचान-आधारित प्राथमिकता ने अन्य कमजोर वर्गों की समस्याओं को अपेक्षाकृत कम ध्यान दिलाया।
- कानूनी अनिवार्यता का अंतर: TAC जैसे निकायों का गठन कुछ संवैधानिक प्रावधानों के तहत अनिवार्य है, जबकि SC परिषद का गठन राज्य सरकार के विवेक पर निर्भर रहा। इस अंतर ने नीतिगत प्राथमिकताओं और संसाधन आवंटन में असमानता पैदा की।
- संगठित नेतृत्व और दबाव का अभाव: जब समुदाय का समेकित नेतृत्व और राजनीतिक दबाव नहीं होता, तो संस्थागत मांगें लंबे समय तक टलती रहती हैं। बिखरी हुई आबादी और नेतृत्व की कमी ने इस प्रक्रिया को धीमा कर दिया।
- प्रशासनिक जटिलताएँ और कार्यान्वयन की कमी: नियमावली, पदों की नियुक्ति और बजटीय घोषणाओं के बावजूद कार्यान्वयन में पारदर्शिता और निरंतरता का अभाव रहा है, जिससे घोषणाएँ कागज़ों तक सीमित रह गईं।
क्या होना चाहिए — एक व्यवहार्य रूपरेखा
- तत्काल अधिसूचना और नियमावली का क्रियान्वयन: 2008 की अधिसूचना और 2025–26 की बजटीय घोषणा को केवल घोषणाओं तक सीमित न रखते हुए नियमावली का शीघ्र और पारदर्शी क्रियान्वयन आवश्यक है।
- प्रतिनिधित्व और समावेशी संरचना: परिषद में समुदाय के विविध वर्गों—महिला, युवा, भूमिहीन और शैक्षिक रूप से पिछड़े समूहों—का समुचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
- पारदर्शिता और जवाबदेही के तंत्र: फंड आवंटन, उपयोग और परियोजना-आधारित परिणामों की सार्वजनिक रिपोर्टिंग अनिवार्य होनी चाहिए। स्वतंत्र ऑडिट और समय-समय पर प्रभाव मूल्यांकन से दुरुपयोग रोका जा सकता है।
- स्थानीय स्तर पर निगरानी और शिकायत निवारण: ब्लॉक और पंचायत स्तर पर उप-समिति बनाकर शिकायतों का त्वरित निवारण और योजनाओं की निगरानी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
- भूमि सुधार और आजीविका सुरक्षा पर केंद्रित नीतियाँ: भूमिहीन परिवारों के लिए लक्षित भूमि-हक और आवास योजनाएँ, साथ ही कौशल-आधारित स्वरोजगार कार्यक्रम, दीर्घकालिक आर्थिक सुरक्षा के लिए अनिवार्य हैं।
निष्कर्ष: परामर्शदात्री परिषद का गठन केवल एक प्रशासनिक कदम नहीं; यह झारखंड के सामाजिक ताने-बाने में न्याय और समावेशन की पुनर्स्थापना का प्रतीक होगा। जब तक कमजोर समुदायों के अनुभवों को सुनने और उन्हें नीतिगत रूप में बदलने के लिए संस्थागत मंच नहीं बनेगा, तब तक संवैधानिक वादे केवल शब्दों तक सीमित रहेंगे। परिषद का सक्रिय, पारदर्शी और जवाबदेह रूप ही उन वर्षों की उपेक्षा को बदलकर वास्तविक परिवर्तन की दिशा खोल सकता है।