झारखंड में SC समाज का 7.63% प्रतिनिधित्व अंतर केवल सांख्यिकीय चूक नहीं, संस्थागत छल है। बिना राजनीतिक इच्छाशक्ति और पारदर्शी परीक्षाओं के, सामाजिक न्याय केवल एक कागजी भ्रम बना रहेगा।
SC समाज : परीक्षाओं का संकट 'संरचनात्मक छल' और सुधार की राह
रांची: झारखंड राज्य की स्थापना सामाजिक न्याय और हाशिए पर पड़े समुदायों, विशेषकर अनुसूचित जाति (SC) समाज की आर्थिक उन्नति की आकांक्षाओं पर आधारित थी। इस वर्ग के लिए सरकारी नौकरियाँ केवल आजीविका का साधन नहीं थीं, बल्कि सदियों के सामाजिक बहिष्कार से मुक्ति और सम्मान का एकमात्र मार्ग भी थीं। तथापि, पिछले दो दशकों में परीक्षाओं की शुचिता में गिरावट और प्रशासनिक विफलताएँ इस समुदाय के लिए एक 'संरचनात्मक छल' सिद्ध हुई हैं।
झारखंड में SC समाज का 7.63% का प्रतिनिधित्व अंतर केवल प्रशासनिक चूक नहीं, गहरी संस्थागत उपेक्षा
- सत्ता का असंतुलन: जनसंख्या के अनुपात में भागीदारी न मिलना संवैधानिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन है।
- बैकलॉग और इच्छाशक्ति: रिक्त पदों का न भरा जाना राजनीतिक उदासीनता का प्रतीक है, जो एक पूरी पीढ़ी को विकास की मुख्यधारा से काट देता है।
- संसाधनों का अभाव: परीक्षाओं का रद्द होना SC छात्रों के लिए प्राणघातक है, क्योंकि उनके पास 'बैकअप' के रूप में न तो पारिवारिक व्यवसाय है और न ही निजी नेटवर्क। उम्र सीमा का बीतना उनके लिए संभावनाओं का अंत है।
यह विसंगति सामाजिक न्याय की विफलता है। बिना 'बैकलॉग' भरे जवाबदेही तय करना और समानता का दावा केवल एक कागजी भ्रम ही बना रहेगा।
प्रश्न-पत्र लीक: मेधा की हत्या और 'धनबल' का उदय
झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) और लोक सेवा आयोग (JPSC) की परीक्षाओं में बार-बार होने वाले 'पेपर लीक' ने मेरिटोक्रेसी (योग्यतावाद) की अवधारणा को ध्वस्त कर दिया है।
- पूंजी का प्रभाव: जब प्रश्न-पत्र लाखों रुपये में बिकते हैं, तो SC समाज का मेधावी छात्र, जिसके माता-पिता दिहाड़ी मजदूर हैं, स्वतः ही प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाता है।
- संस्थागत क्षरण: परीक्षाओं में नेपाल कनेक्शन और उच्च अधिकारियों की संलिप्तता यह दर्शाती है कि भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हैं। यह उन गरीब छात्रों के साथ विश्वासघात है जो अपने सीमित संसाधनों के साथ एक 'निष्पक्ष खेल' की उम्मीद करते थे।
आर्थिक और मनोवैज्ञानिक प्रहार: एक अदृश्य त्रासदी
प्रतियोगी परीक्षाओं का रद्द होना निर्धन SC परिवारों के लिए एक असहनीय आर्थिक बोझ और मानसिक प्रताड़ना है।
- आर्थिक ऋण चक्र: एक SC छात्र को कोचिंग और शहरी आवास (रांची/हजारीबाग) के लिए औसतन ₹4,000 - ₹6,000 मासिक खर्च करना पड़ता है। इसके लिए परिवार अक्सर ऊंची ब्याज दरों पर कर्ज लेते हैं। परीक्षा रद्द होने का अर्थ है उस कर्ज के बोझ का और अधिक गहरा होना।
- मनोवैज्ञानिक आघात: अध्ययनों के अनुसार, 66.8% छात्र निरंतर हताशा और "होपलेसनेस" (आशाहीनता) का शिकार हैं। SC छात्रों के लिए शिक्षा गरीबी के दुष्चक्र से बाहर निकलने का एकमात्र माध्यम है; जब यह मार्ग अवरुद्ध होता है, तो उनमें व्यवस्था के प्रति गहरा असंतोष और हीन भावना जन्म लेती है।
समाधान की रूपरेखा: 'सामाजिक न्याय बहाली' नीति
केवल कड़े कानून बनाना पर्याप्त नहीं है; व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव की आवश्यकता है जो विशेष रूप से वंचित वर्गों के हितों की रक्षा करे।
क . प्रशासनिक एवं तकनीकी सुधार
- ब्लॉकचेन तकनीक: प्रश्न-पत्रों की सुरक्षित डिजिटल डिलीवरी सुनिश्चित की जाए ताकि मानवीय हस्तक्षेप शून्य हो सके।
- मिशन 12.08: एक विशेष भर्ती अभियान के माध्यम से अगले 3 वर्षों में SC समुदाय का प्रतिनिधित्व उनके जनसंख्या अनुपात (12.08%) के बराबर लाने का लक्ष्य रखा जाए।
ख . छात्र सुरक्षा जाल (Safety Net)
- निरस्तीकरण मुआवजा: यदि सरकारी विफलता के कारण परीक्षा रद्द होती है, तो SC/ST छात्रों को ₹5,000 की तैयारी क्षतिपूर्ति दी जाए।
- निःशुल्क परिवहन एवं परामर्श: परीक्षाओं के लिए मुफ्त बस/ट्रेन पास और जिला स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य परामर्श केंद्र अनिवार्य हों।
ग . विधिक जवाबदेही
- व्हिसलब्लोअर सुरक्षा: धांधली की सूचना देने वाले छात्रों को सुरक्षा दी जाए।
- फास्ट-ट्रैक कोर्ट: पेपर लीक के 'मास्टरमाइंड' को 6 महीने के भीतर सजा दिलाने के लिए विशेष अदालतों का गठन हो।
सामाजिक अनुबंध का पुनर्जीवन
झारखंड में भर्ती परीक्षाओं की शुचिता का प्रश्न केवल प्रशासनिक सुधार का विषय नहीं है, बल्कि यह राज्य के उस सामाजिक अनुबंध को बचाने का सवाल है जो 2000 में इसके गठन के समय किया गया था। जब तक व्यवस्था में पारदर्शिता और SC समाज के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित नहीं किया जाता, तब तक विकास के दावे खोखले रहेंगे। राज्य को 'पारदर्शिता के साथ सहानुभूति' का दृष्टिकोण अपनाकर अपने युवाओं के टूटे हुए विश्वास को फिर से जोड़ना होगा।