झारखंड: 'आदिवासी-गैर-आदिवासी' विमर्श ने अनुसूचित जाति समुदाय को अन्यायी बाहरी तत्वों (दिक्कू) के साथ एक ही श्रेणी में रख दिया है। जो न केवल ऐतिहासिक अन्याय है, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान और जड़ों की उपेक्षा भी है।

रांची: झारखंड की सामाजिक-राजनीतिक संरचना में अनुसूचित जाति (SC) की स्थिति दो पाटों के बीच पिस रहा है। झारखंड के परिदृश्य में 'आदिवासी-गैर-आदिवासी' का विमर्श इतना प्रभावी रहा है कि इसने उन समुदायों को भी हाशिए पर धकेल दिया, जो सदियों से इस मिट्टी के अभिन्न अंग रहे हैं। इस विमर्श ने अनुसूचित जाति समुदाय को अन्यायी बाहरी तत्वों (दिक्कू) के साथ एक ही श्रेणी में रख दिया है। जो न केवल ऐतिहासिक अन्याय है, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान और जड़ों की उपेक्षा भी है।

इस समुदाय की नियति एक गहरी विडंबना से घिरी गई, जहाँ वे सामाजिक और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर बेदखल कर दिए गए। एक ओर वे पारंपरिक जातिगत व्यवस्था में सवर्ण दमन और छुआछूत की ऐतिहासिक प्रताड़ना झेलते रहे, तो दूसरी ओर झारखंड राज्य के गठन के बाद उभरी 'आदिवासी अस्मिता' की प्रबल राजनीति ने उन्हें वैचारिक रूप से 'दिक्कू' (बाहरी) की श्रेणी में धकेल कर सत्ता के गलियारों से ओझल कर दिया। मसलन यह जीवंत समुदाय अपनी ही धरती पर पहचान विहीन होकर 'अदृश्य नागरिक' बन गया है। ​

1. मुद्दों के अलग होने के प्रमुख कारण

  • जल-जंगल-जमीन बनाम सामाजिक छुआछूत: ST राजनीति का मुख्य केंद्र 'जमीन' (CNT/SPT एक्ट) और अपनी विशिष्ट 'सांस्कृतिक पहचान' बचाना है। इसके विपरीत, SC समाज का संघर्ष मुख्य रूप से सामाजिक भेदभाव, भूमिहीनता और विकास की मुख्यधारा में भागीदारी को लेकर है।
  • संवैधानिक प्रावधान: ST को संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत विशेष स्वायत्तता प्राप्त है, जबकि SC समाज अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का अंत) और सामान्य आरक्षण नीतियों पर अधिक निर्भर है।
  • आदिवासी बनाम मूलवासी का द्वंद्व: झारखण्ड में 'आदिवासी' (ST) होना एक राजनीतिक शक्ति है। कई बार 'मूलवासी' (जिसमें SC भी आते हैं) को आदिवासियों के हितों के मुकाबले दोयम दर्जे पर देखा जाता है, जिससे हितों का टकराव होता है।

SC समाज खुद को हाशिए पर क्यों पाता है?

  • संख्या बल और राजनीतिक प्रतिनिधित्व: झारखण्ड में ST की आबादी लगभग 26% है, जबकि SC लगभग 12% हैं। विधानसभा में ST के लिए 28 सीटें आरक्षित हैं, जबकि SC के लिए मात्र 9 सीटें। इस भारी अंतर के कारण राज्य की सत्ता की चाबी हमेशा ST नेतृत्व के पास रहती है।
  • नेतृत्व का अभाव: झारखण्ड आंदोलन मुख्य रूप से आदिवासी पहचान पर केंद्रित था। इस वजह से राज्य बनने के बाद भी SC समाज से कोई बड़ा कद्दावर नेता नहीं उभर पाया जो पूरे राज्य के SC वोट बैंक को एकजुट कर सके।
  • आर्थिक भूमिहीनता: आदिवासियों के पास CNT/SPT के कारण कम से कम कागजों पर जमीन का मालिकाना हक है, लेकिन झारखण्ड का एक बड़ा SC तबका खेतिहर मजदूर या भूमिहीन है, जो उन्हें आर्थिक रूप से कमजोर बनाता है।

ST थिंक टैंक और राजनीति का रुख

​ST राजनीति और थिंक टैंक का SC के साथ खड़ा न दिखने के पीछे 'संसाधन प्रतिस्पर्धा' एक बड़ा कारण है:

  • आरक्षण का डर: कई बार ST थिंक टैंक को लगता है कि यदि SC या पिछड़ों के अधिकारों का दायरा बढ़ता है, तो राज्य के सीमित संसाधनों और नौकरियों में उनका हिस्सा कम हो सकता है।
  • पहचान की रक्षा: ST समाज अपनी विशिष्ट परंपराओं (जैसे सरना कोड) को लेकर बहुत सजग है। उन्हें डर रहता है कि व्यापक 'दलित-बहुजन' राजनीति में उनकी विशिष्ट जनजातीय पहचान कहीं खो न जाए।

​झारखण्ड में एससी समुदाय वंचितों के बीच भी अधिक वंचित वाली स्थिति में है। यहाँ सत्ता का विमर्श 'आदिवासीवाद' के इर्द-गिर्द घूमता है। इस विमर्श में SC समाज एक 'साइलेंट माइनॉरिटी' बनकर रह गया है, जिसकी जरूरत चुनावों में तो पड़ती है, लेकिन नीति-निर्धारण में उनकी भागीदारी नगण्य रहती है।

सटीक समाधान या राह

​SC समाज की स्थिति सुधारने और दोनों वर्गों के बीच तालमेल बिठाने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं:

  1. 'आदिवासी-मूलवासी' साझा मंच: राजनीति को केवल 'आदिवासी' केंद्रित न रखकर 'झारखण्डी' पहचान पर केंद्रित करना होगा, जिसमें SC समाज को बराबर का हितधारक माना जाए।
  2. SC आयोग का सुदृढ़ीकरण: राज्य में SC आयोग को केवल संवैधानिक ढांचा न रखकर उसे न्यायिक और कार्यकारी शक्तियां दी जाएं ताकि वे भूमिहीनता और उत्पीड़न के मामलों पर सीधा एक्शन ले सकें।
  3. विशेष आर्थिक पैकेज (Sub-Plan): जैसे जनजातीय उप-योजना (TSP) होती है, वैसे ही SC समाज के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में बजट का आवंटन और विशेष स्वरोजगार योजनाएं लानी होंगी।
  4. साझा थिंक-टैंक: ST और SC बुद्धिजीवियों को एक साझा मंच बनाना चाहिए जो 'साझा दुश्मनों' (विस्थापन, गरीबी, अशिक्षा) के खिलाफ मिलकर नीति बनाए, न कि आपस में संसाधनों के लिए लड़े।